“बहाने से ही आ ”
मेरी मोह्हब्ब्त का सिला मुझको मिले कुछ ऐसे ,
तुझे पाने की तम्मना मैं जीना दुशवार हो जाए ,
आज तू मुझे खाक मे मिलाने के बहाने से ही आ .
तेरी यादों का पहरा मेरी धड़कन पे अब ना रहे ,
मेरे हाथों से तेरा दामन भी कुछ छुट जाए ऐसे ,
आज तू मुझपे इतने सितम ढाने के बहाने से ही आ .
इन निगाहों के सिसकते इंतजार बिखर जायें कुछ ऐसे ,
की मेरी आंखों की नमी भी छीन जाए मुझसे ,
आज तू मुझे यूं बेइन्तहा रुलाने के बहाने से ही आ .
ये दिल एक पल मे टूट के बिखर जाए कुछ इस तरह ,
की मेरी हर एक आरजू और उम्मीद का जनाजा निकले,
आज तू मुझे इस कदर ठुकराने के बहाने से ही आ
रचना अनिल.मनाली@जीमेल.कॉम

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