Thursday, May 20, 2010

hasya kabita

बोर्ड की परीक्षा में
हाई स्कूल की कक्षा में
एक भाई साहब
मेज पर चाकू गाड़े
परीक्षा देने में तल्लीन थे ।
निरीक्षक ने देखा
पहले खिसिआया
फिर झल्लाया
अंत में छात्र के समक्ष
करबद्ध हो कर
धीरे से बड़बड़ाया ।
हे आर्य ! हे करूश्रेष्ठ
आप कॉपी रूपी रणक्षेत्र में
युद्ध खंजर से क्यूं लड़ रहे हैं घ्
कॉपी पर जूझ रहा छात्र
गुरू को कुपित नेत्रों से घूर कर
ज़ोर से चिघांड़ा ।
हे विद्यापति ! हे गुरूवर !
भगवान ने आपको
दो आंखें मुफ्त में दीए
ऊपर से आपने
लालटेन भी लगा ली ।
पर आप ये न समझ पाये
कि मैंने चाकू
प्रश्नपत्र पर क्यूं गाड़ा है ।
हे विद्यानिधि !
आपके पंखे में रेग्युलेटर नहीं है ।
ये तीन पंखों की चिरईया
फुल स्पीड पर फड़फड़ा रही है ।
मेरा प्रश्न पत्र
इसकी तीव्र वायु से
उड़ा जा रहा था ।
अतः
मैंने इसकी लाश पर
चाकू गाड़ कर
इसको उड़ने से वंचित कर दिया है ।
और कोई बात नहीं
ये तो मात्र पेपरवेट है ।

posted by anil.manali@gmail.com

Friday, May 14, 2010

bhikhari

"मैं भीख क्यों मांगता"

भिखारी के हाथ मे
रोटी देख ललचाये कुत्त्ते
ने पूंछ हिलाई
भिखारी ने हाथ की रोटी
भूखे कुत्ते को जा थमाई
यह मंजर देख रही
अम्माजी ने पूछा
खुद भूखा था फिर रोटी
कुत्ते को क्यों दे डाली
बेजुबान प्राणी बेचारा
और कहां जाएगा,
मुझसे ज्यादा भूखा था ,
कहां से रोटी पायेगा,
मै तो जब हाथ फैलाऊंगा,
कोई ना कोई दे ही जायेगा,
सुन कर चौंक गयी अम्माजी ,
इतनी अक्ल रही जब तुझमे,
भीख काहे को मांगे है,
भिखारी बोला,
अजब जमाना आया है अम्मा,
तरस खाकर रोटी मिल जाती,
काम नहीं मिल पाया है,
काम अगर मिल जाता तो
मैं भीख क्यों मांगता?

रचना अनिल.मनाली@जीमेल.कॉम 

kisi bhi bahane se aa

“बहाने से ही आ ”


मेरी मोह्हब्ब्त का सिला मुझको मिले कुछ ऐसे ,

तुझे पाने की तम्मना मैं जीना दुशवार हो जाए ,

आज तू मुझे खाक मे मिलाने के बहाने से ही आ .


तेरी यादों का पहरा मेरी धड़कन पे अब ना रहे ,

मेरे हाथों से तेरा दामन भी कुछ छुट जाए ऐसे ,

आज तू मुझपे इतने सितम ढाने के बहाने से ही आ .


इन निगाहों के सिसकते इंतजार बिखर जायें कुछ ऐसे ,

की मेरी आंखों की नमी भी छीन जाए मुझसे ,

आज तू मुझे यूं बेइन्तहा रुलाने के बहाने से ही आ .


ये दिल एक पल मे टूट के बिखर जाए कुछ इस तरह ,

की मेरी हर एक आरजू और उम्मीद का जनाजा निकले,

आज तू मुझे इस कदर ठुकराने के बहाने से ही आ

रचना अनिल.मनाली@जीमेल.कॉम 

zindagi ka takaza


जिंदगी का ना जाने मुझसे और तकाजा क्या है ,

इसके दामन से मेरे दर्द का और वादा क्या है ????

एहसान तेरा है की दुःख दर्द का सैलाब दिया ,
मेरी आँखों को तुने आंसुओं से तार दिया..
एक बार भी न समझा मुझे भाता क्या है?????

छीन कर बैठ गयी मेरी मोहब्बत को कभी,
जब भी मिली एक नयी चाल मेरे साथ चली,
मेरी तकदीर से अब तेरा इरादा क्या है??????


जब भी मिलती है कहीं रूठ के चल देती है,
मेरे दिल को तू फिर एक बार मसल देती है
हैरान हूँ मुकदर को मेरे तराशा क्या है ?????

कौन सी खताओं की मुझे रोज सजा देती है,
मुश्किलें डाल के बस मौत का पता देती है ...
तेरा अब मेरी वफाओं मे और इजाफा क्या है ?????

जिंदगी का ना जाने मुझसे और तकाजा क्या है ,
इसके दामन से मेरे दर्द का और वादा क्या है????

kuch lamhe

तुम्हें देखने को तरसती हैं आँखें,
बहुत याद कर के बरसती हैं ऑंखें...........

जब जब ख्यालों में लातें हैं तुमको,
शर्मो हया से लरजती हैं ऑंखें ............

फूलों का तबस्सुम, या पतझड़ का मौसम,
तेरी बाट मे ही सरकती हैं ऑंखें.................

यूँ तन्हाई मे जब बिखरता है दामन,
तेरे साथ को बस सिसकती हैं आंखें...........

चिरागों के लौ मे भी जान ना रहे जब,
ग़म -ऐ-इश्क में फिर दहकती हैं ऑंखें.
जब तितलियाँ इठलाती हुई, पंख फद्फदाती  हुई,
अपने शूल को चुभो कर रस चूसती हैं,
पीड़ा होती है, कराह पड़ता हु मैं,
पर मेने तुम्हारी सिसकियो को कभी नहीं सुना,
यही चलन हे कुल का अपने,
ऐसा विचार कर चुप रहा, दर्द सहा,
फिर भी मस्त रहा,

इस पर दूसरा बोला,


बाग़ को महकने के लिए,
अपनी संतति को बढ़ने के लिए
चक्षुओ में स्नेह दर्शाने के लिए,
सदियों के दुःख सहे hain हमने,


अजीब है न ये baat,
मुझको भी भेदा था इसने,


आज फूलो का आह समझ में आया है ,
खिलखिलाहट के पीछे का दर्द समझ में आया है,
मुस्कराहट के पीछे की ये दास्ताँ दिल पे निशान छोड़ गयी,
और कागज पर बिखर एक संजीदा व्यथा बोल गयी,


.........अनिल.मनाली@जीमेल.कॉम........

meri kavita


कल शेल्फ से किताबे निकलते वक़्त,
चींटियो की लम्बी कतार देखी......


चली जा रही थे.......
चौकन्नी......तेज़ रफ़्तार ......
अपने गंतव्य की ओर......


उनमे से कुछ लुढकी, गिर पड़ी...


गिरने वाली को
किसी ने नहीं देखा..
न सहारा दिया....


जो गिरी थी
उसने झट से उठ.....
फिर से दौड़ना शुरू किया...


हाँ ! कुछ ने बाते की,
मुलाकाते भी की....
फिर चल पड़ी अपने अपने रास्ते...


ये सब देख कर एक ख्याल यु ही आ गया.................


"ज़िन्दगी की दौड़ में,
खाने-पीने की जद्दोजहद में,
मिलकर बिछुड़ते, रिश्ते हो जैसे"

रचना:- अनिल.मनाली@जीमेल.कॉम