Friday, May 14, 2010

meri kavita


कल शेल्फ से किताबे निकलते वक़्त,
चींटियो की लम्बी कतार देखी......


चली जा रही थे.......
चौकन्नी......तेज़ रफ़्तार ......
अपने गंतव्य की ओर......


उनमे से कुछ लुढकी, गिर पड़ी...


गिरने वाली को
किसी ने नहीं देखा..
न सहारा दिया....


जो गिरी थी
उसने झट से उठ.....
फिर से दौड़ना शुरू किया...


हाँ ! कुछ ने बाते की,
मुलाकाते भी की....
फिर चल पड़ी अपने अपने रास्ते...


ये सब देख कर एक ख्याल यु ही आ गया.................


"ज़िन्दगी की दौड़ में,
खाने-पीने की जद्दोजहद में,
मिलकर बिछुड़ते, रिश्ते हो जैसे"

रचना:- अनिल.मनाली@जीमेल.कॉम 

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