Friday, May 14, 2010

जब तितलियाँ इठलाती हुई, पंख फद्फदाती  हुई,
अपने शूल को चुभो कर रस चूसती हैं,
पीड़ा होती है, कराह पड़ता हु मैं,
पर मेने तुम्हारी सिसकियो को कभी नहीं सुना,
यही चलन हे कुल का अपने,
ऐसा विचार कर चुप रहा, दर्द सहा,
फिर भी मस्त रहा,

इस पर दूसरा बोला,


बाग़ को महकने के लिए,
अपनी संतति को बढ़ने के लिए
चक्षुओ में स्नेह दर्शाने के लिए,
सदियों के दुःख सहे hain हमने,


अजीब है न ये baat,
मुझको भी भेदा था इसने,


आज फूलो का आह समझ में आया है ,
खिलखिलाहट के पीछे का दर्द समझ में आया है,
मुस्कराहट के पीछे की ये दास्ताँ दिल पे निशान छोड़ गयी,
और कागज पर बिखर एक संजीदा व्यथा बोल गयी,


.........अनिल.मनाली@जीमेल.कॉम........

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